राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी'

राख सा दिखता हूँ, कभी आग बन जाऊंगा. टूटा हुआ सितार हूँ, कभी साज बन जाऊंगा. कलम टूटने के बाद स्याही बिखर जाती है, चुपचाप लिखता हूँ आज, कभी आवाज बन जाऊंगा..

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ओ बी ओ के तरही मुशायरा २१ के लिए

Posted On 30 Mar, 2012 में

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अकड़ में नरमी, अदा में गरमी, कभी हमारे सजन में आये,
वफ़ा के सच्चे, जबाँ के जलवे, कभी किसी आचरन में आये.
.
समा बंधा है, सुकूँ बहुत है, मगर वो वादा जहन में आये,
चलो लगायें फिर एक नश्तर, कि दर्द पिछला सहन में आये.
.
उतार कोकुन, निकाल चश्मा, वो मेरे वातावरण में आये,
मली फिजा है, हमारे ‘रु’ में, हवा से सिहरन बदन में आये.
.
ये नब्ज डूबी ही जा रही थी, कफ़न से ढकने, वो आये मुझको,
मेरे तबस्सुम का राज ये है, ‘किसी तरह संवरण में आये’.
.
यहाँ मचलती जो भूख हर दिन, नहीं है चर्चा किसी अधर पर,
चहकते प्यादे, सवरते रस्ते, वो आज-कल आचमन में आये.
.
नहीं मयस्सर है साफ़ पोखर, हमें पिलाते हैं नारे-वादे,
मिला न पानी जो लान को तो, वो मुद्दतो में शिकन में आये,
.
फिजां में घोले, हवा सियासी, वो लूटने क्यों अमन को आया?
जिया में कुरसी हिलोर खाती, कि ‘राम’ तो बस कथन में आये.
.
नहीं कदर है, वो बात बेजा, लबों पे आये, जो वक्त पहले,
विचार जब निज चरित में आये, कथन तभी अनुकरण में आये.
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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rakesh के द्वारा
April 2, 2012

मित्रवर श्री चन्दन जी, सादर! भई आपकी हौसला अफजाई के लिए हार्दिक आभार.

चन्दन राय के द्वारा
March 31, 2012

अकड़ में नरमी, अदा में गरमी, कभी हमारे सजन में आये, वफ़ा के सच्चे, जबाँ के जलवे, कभी किसी आचरन में आये. बहुत बहुत ही उम्दा आपका मित्र http://chandanrai.jagranjunction.com

Rakesh के द्वारा
March 31, 2012

आदरणीय प्रदीप जी, श्री अशोक जी, मान्यवर दिनेश जी, गरिमामयी मीनू जी, मित्रवर श्री योगी जी, एवं अनिल जी, जिस तरह से आप लोग मुझे प्रोत्साहित कर रहे हैं, और ओ बी ओ पर गुरु जनो की सिखाने की चेष्टा रही है, यह उसी का परिणाम है, मित्र योगी जी: हमारे गुरुजन गुणों की खान हैं, अगर मुझ जैसा कोयला कुछ कर पता है, तो ये सब उन्ही की दें है. मित्र अनिल जी: आपके कमेन्ट से पता लगता है की आप कितने गुनग्राही व्यक्ति है, कमियों को नजरअंदाज करके बस उज्जवल पक्ष की उर इशारा कर मित्र को प्रोत्साहित करते हैं. बहुत बहतु आभार.

March 31, 2012

नमस्कार मित्र! जिस लय और अंदाज में आप लिखे हो पढ़ने के बाद …….अब क्या कहूँ ..एक साथ कई शैली उभर कर आती है इससे …धीरे-धीरे पढ़िए तो मन हास्य व्यंग्य पर फुदकने लगता है…..एक लय में पढ़िए तो रोम-रोम उत्तेजित हो जाता है…………और बुलंद आवाज में पढ़िए तो नशों से रक्त बाहर निकलने को उद्देलित हो जाता है……कमाल की कृति….

yogi sarswat के द्वारा
March 31, 2012

यहाँ मचलती जो भूख हर दिन, नहीं है चर्चा किसी अधर पर, चहकते प्यादे, सवरते रस्ते, वो आज-कल आचमन में आये. राकेश जी नमस्कार ! मोतियों को चुन चुन कर ला रहे हैं आप अपने खजाने में से इस मंच के लिए ! आभार !

minujha के द्वारा
March 31, 2012

फिजां में घोले, हवा सियासी, वो लूटने क्यों अमन को आया? जिया में कुरसी हिलोर खाती, कि ‘राम’ तो बस कथन में आये. राकेश जी, वाह वाह करने  का दिल कर रहा है,बहुत अच्छा लिखा है आपने

dineshaastik के द्वारा
March 31, 2012

व्यंगात्मक शैली में सुन्दर रचना के लिये बधाई…. फिजां में घोले, हवा सियासी, वो लूटने क्यों अमन को आया? जिया में कुरसी हिलोर खाती, कि ‘राम’ तो बस कथन में आये.

akraktale के द्वारा
March 30, 2012

राकेश जी नमस्कार, नहीं मयस्सर है साफ़ पोखर, हमें पिलाते हैं नारे-वादे, मिला न पानी जो लान को तो, वो मुद्दतो में शिकन में आये, सियासत दारो पर करारे प्रहार करती सुन्दर रचना. बधाई.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 30, 2012

समा बंधा है, सुकूँ बहुत है, मगर वो वादा जहन में आये, चलो लगायें फिर एक नश्तर, कि दर्द पिछला सहन में आये. अच्छा सम्मिश्रण भाषा का. भाव पक्ष सुन्दर. बधाई. स्नेही राकेश जी. मेहनत रंग जरूर लाती है. सादर.

MAHIMA SHREE के द्वारा
March 30, 2012

नहीं मयस्सर है साफ़ पोखर, हमें पिलाते हैं नारे-वादे, मिला न पानी जो लान को तो, वो मुद्दतो में शिकन में आये, नमस्कार राकेश जी क्या बात है….आप तो निखरते जा रहे है…. हरेक पंक्तिया ..बहुत खास है….बहुत अच्छी है….बहुत-२ बधाई..

    Rakesh के द्वारा
    March 31, 2012

    आदरणीय महिमा जी, सादर नमस्कार एवं हार्दिक धन्यवाद. अब आपको तो मालूम ही है की गुरुजनों का कितना आशीर्वाद है मुझ पे, बस शिष्य धर्म निभाने की एक चेष्टा की है.


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