राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी'

राख सा दिखता हूँ, कभी आग बन जाऊंगा. टूटा हुआ सितार हूँ, कभी साज बन जाऊंगा. कलम टूटने के बाद स्याही बिखर जाती है, चुपचाप लिखता हूँ आज, कभी आवाज बन जाऊंगा..

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हमको बहुत लूटा गया

Posted On: 25 Mar, 2012 में

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हमको बहुत लूटा गया,
फिर घर मेरा फूंका गया.


झगड़ा रहीम-औ-राम का,
पर, जान से चूजा गया.


दर पर, मुकम्मल उनके था,
बाहर गया, टूटा गया.


भारी कटौती खर्चो में,
मठ को बजट पूरा गया ,


मजलूम बन जाता खबर,
गर ऐड में ठूँसा गया. (ऐड = प्रचार/विज्ञापन/Advertisement)


उत्तम प्रगति के आंकड़े,
बस गाँव में, सूखा गया.


वादा सियासत का वही,
पर क्या अलग बूझा गया!!


है चोर, पर साबित नहीं,
दरसल, वही पूजा गया.


माझी, सयाना वो मगर,
मन से नहीं जूझा, गया.


वो कब मनाने आये थे?
हम से नहीं, रूठा गया.


चोटें तो दिल पर ही लगी,
खूं आँख से चूता गया.


जो चुप रहे, ढक आँख ले,
राजा ऐसा, ढूंढा गया.


पैसों से या फिर डंडों से,
सर जो उठा, सूता गया.


दारु बँटा करती यहाँ!
यह वोट भी, ठूँठा गया. (ठूँठ = NULL/VOID)


संन्यास ले, बैठा कहीं,
घर जाने का, बूता गया.


नव वर्ष ‘मंगल’ कैसे हो?
दिन आज भी रूखा गया.


खोजा “खुदा” वो ता-उमर!
आगे से इक भूखा गया.


पीछे रहा है ‘बस्तिवी’!
सर पर नहीं कूदा गया.


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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rakesh के द्वारा
March 28, 2012

आदरणीय श्री शशि जी, श्री जय प्रकाश जी, एवं श्री योगी जी, सादर नमस्कार एवं रचना को रारहने के लिए हार्दिक धन्यवाद. श्रद्धेय श्री शशि जी: आप के मुख से तारीफ सुन कर एवं प्रगति की बात सुन कर, मन झूम गया. और सुझाव बनाए रक्खें, कमियां गिनाते रहें, नहीं तो प्रगति यही रुक जाएगी. सादर नमस्कार.

shashibhushan1959 के द्वारा
March 26, 2012

मान्यवर राकेश जी, सादर ! बहुत उत्कृष्ट और सधी हुई रचना ! ये आपकी अभी तक के परिश्रम की सर्वोत्कृष्ट रचना है ! हार्दिक बधाई ! उन्नति-पथ पर अग्रसर हों !!!

Jayprakash Mishra के द्वारा
March 26, 2012

वाह राकेश जी .हर क्षेत्र का खय़ाल रखा है.

yogi sarswat के द्वारा
March 26, 2012

उत्तम प्रगति के आंकड़े, बस गाँव में, सूखा गया. बहुत ही साढ़े हुए शब्दों में एक आम आदमी की व्यथा और उसकी मजबूरियों को व्यक्त किया है आपने ! बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति और उससे भी ज्यादा सुन्दर शब्दों का प्रयोग !

Rakesh के द्वारा
March 26, 2012

आदरणीय दिनेश जी, श्री अशोक जी, एवं श्री वैद्य जी, आप सभी लोग ने इस रचना को सराहा, आप सभी को मेरा हार्दिक धन्यवाद एवं अभिनन्दन. श्री दिनेश जी, आप जैसे रचनाकार के मुख से अपनी तारीफ सुन कर अति उत्साहित हूँ, भविष्य में और अच्चा करने का प्रयत्न करूँगा. धन्यवाद.

dineshaastik के द्वारा
March 26, 2012

वाह…..वाह…..वाह….कमाल की रचना…… हर पंक्ति लाजबाव। किसकी कम तारीफ करूँ किसकी ज्यादा यह समझ नहीं आता। बस इतना ही कहूँगा, सब एक दूसरे से खूबसूरत हैं। शब्दों का अथाह भंडार है आपके पास।

vaidya surenderpal के द्वारा
March 25, 2012

राकेश जी नमस्कार. बहुत अच्छी एवं यथार्थ को दर्शाती रचना…….हार्दिक आभार. 

akraktale के द्वारा
March 25, 2012

राकेश जी, बहुत खूब सुन्दर रचना बधाई.

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
March 25, 2012

ग़ज़ल फॉर्म की समसामयिक कविता, राकेश जी, बधाई !!

    Rakesh के द्वारा
    March 26, 2012

    श्रद्धेय आचार्य जी, सादर नमस्कार. आपका कमेन्ट यहाँ ख़ास मायने रखता है, आभार.

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
March 25, 2012

बहुत अच्छी एवं यथार्थ को दर्शाती कविता,राकेश जी.क्या ही सुन्दर पंक्तियाँ हैं…. वो कब मनाने आये थे? हम से नहीं, रूठा गया. चोटें तो दिल पर ही लगी, खूं आँख से चूता गया.

    Rakesh के द्वारा
    March 26, 2012

    माननीय राजीव जी, सादर नमस्कार. आपकी दाद दिल में बस जाती है, धन्यवाद.

March 25, 2012

नमस्कार मित्र! झगड़ा रहीम -औ-राम का, पर, जान से चूजा गया………तत्कालीन परिवेश को व्यक्त करती हुई पंक्तियाँ…….हार्दिक आभार.

    Rakesh के द्वारा
    March 26, 2012

    श्रीमान अनिल जी , सादर धन्यवाद.

Rakesh के द्वारा
March 25, 2012

श्रद्धेय श्री प्रदीप जी एवं गरिमामयी मीनू जी, सादर नमस्कार एवं धन्यवाद. मुझ तुच्छ से निम्न पंक्तियाँ बन पड़ी हैं, आपकी सेवा में, कृपया गौर फरमाए: खुद पे अगर पाबन्दी हो मुश्किलें आँखें मूंद लेती है होंसले हो बुलंद अगर मंजिल कदम चूम लेती है धन्यवाद.

minujha के द्वारा
March 25, 2012

राकेश जी व्यवस्था पर  कङी चोट करती एक अच्छी रचना बधाई

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 25, 2012

होंसले हो बुलंद गर मुश्किलें पनाह लेती है खुद पे अगर पाबन्दी हो मंजिल कदम चूम लेती है ….इसको ठीक करिए. ये मेरा शेर है. स्नेही राकेश जी , सादर. हीरे निकलने शुरू हो गएँ हैं. होश न खोना , आग में ताप के ही निकलता है खरा सोना. ..ये भी मेरा है. बधाई. में खुश हूँ.

    jlsingh के द्वारा
    March 26, 2012

    महंगाई का रोना छोड़ो ‘ग्रोथ रेट’ की बात करो! महंगाई का बढ़ना यानी उत्पादन निर्यात करो! उपर्युक्त पंक्तियाँ मेरी है, मनमोहन सिंह की नहीं….. !!! राकेश जी और कुशवाहा जी, को नमस्कार और सुप्रभात!


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