राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी'

राख सा दिखता हूँ, कभी आग बन जाऊंगा. टूटा हुआ सितार हूँ, कभी साज बन जाऊंगा. कलम टूटने के बाद स्याही बिखर जाती है, चुपचाप लिखता हूँ आज, कभी आवाज बन जाऊंगा..

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मैखाना है

Posted On 21 Mar, 2012 में

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ऐसा लगता है की मेरा यों अब गुजरा जमाना है,
बेगाना रुख किये ‘साकी’! यहाँ तेरा मैखाना है.


फकीरों को कहाँ यारो कभी मिलता ठिकाना है,
बना था आशियाना, आज जो बिसरा मैखाना है!


कभी अपना बना ले पर कभी बेदर्द ठुकरा दे,
सयाना जाम साकी! और आवारा मैखाना है.


तेरी हर एक हंसी पर ही चहक कर के मचल जाना.
हमेशा हुस्न-ए-जलवो पर जहाँ हारा मैखाना है.


तेरी तस्वीर के बिन ही मै पीने आज बैठा हूँ,
ख़ुशी या गम हो जुर्माना मुझे मारा मैखाना है.


हमेशा ही परोसे जाम हर ‘शीशे’ में वो भर के,
सरापा पीने के जज्बातों को प्यारा मैखाना है.


छलावे में कभी इन्सान से पाला नहीं पड़ता,
छिपाया है हकीकत से वो एक तारा मैखाना है.


बुढ़ापे में यही बेटों ने ‘बस्तीवी’ दिया ताना,
जवानी में लुटाया दोस्तों पे सारा मैखाना है.


	     

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

dineshaastik के द्वारा
March 23, 2012

राकेश जी आपकी रचना को समर्पित चंद पंक्तियाँ स्वीकृत करें धर्म मय, ग्रंथ प्याले, धर्मगुरूओॆ को साकी मानता हूँ मैं, मंदिर मस्जिद शराबखानों के पास मुझे नहीं जाना है। एकता मय, विचारों के प्याले में भर कर क्यों न पिये, एक दूसरे के साकी बने,  मंच ही हमारा मयखाना है।

akraktale के द्वारा
March 22, 2012

राकेश जी, छ लिखने के लिए chh का ही प्रयोग करें, कृपया त्रुटिवश छपे शब्दों को एडिट में जाकर सुधार करें.धन्यवाद.

    Rakesh के द्वारा
    March 22, 2012

    क्षमा प्रार्थी हूँ कमेन्ट दुबारा न पढ़ने के लिए, अभी ठीक कर लिया, बहुत बहुत धन्यवाद.

Rakesh के द्वारा
March 22, 2012

आदरणीय प्रदीप जी, श्री अशोक जी, श्री विक्रम जी, श्री अनिल जी एवं श्री योगी जी, आप सभी लोगो ने ये कविता पढ़ीं और यह पेज छोडने से पहले अपने बहुमूल्य विचार मेरे लिए रख छोड़े , इसके लिए ह्रदय से आभारी हूँ. श्री प्रदीप जी: सादर! अगर आप इस काव्य में एक पल के लिए भी दुबे, तो लिखना धन्य हो गया. धन्यवाद. श्री अशोक जी: बहुत खूब एक आशार आपने कह दिया, बधाई हो आपको भी. आपके लिए ही हरिवंश जी ने लिखा है की, जला ह्रदय की भट्टी खिंची! श्री विक्रम जी: आपने तो एकदम कमल का शेर प्रस्तुत किया, सजा तो हुक्मन को ऐसे ही हीनी चाहिए, पिला के मारो तो मजा कुछ और होगा. श्री योगी जी: जैसा मैंने पहले ही कहा था की यू पी का बस्ती जिला अपने पितरों की भूमि है, उसे अपने नाम के साथ जोड़ लिया है, जहाँ भी जाऊँगा साथ रहेगा. श्री अनिल जी: ‘Punctuation’ वाली बात मेरे दिमाग को खटक रही थी, किन्तु आप यों कह ले की आलस वश या फिर लापरवाही की वजह से ठीक नहीं की, आपने ये चिन्हित कर बहुत बड़ा उपकार किया है. आप तो मित्र है, आप जो भी कहेंगे मेरी भलाई के लिए ही, है ना! जरा निम्न पंक्तियों पर गार कीजिये: चलो देखें, हमारी आँखों में, कितनी नमी है? इरादे आसमां जैसे, ढके पूरी जमीं है, सड़क की ठोकरें, यों पाठ तू बनती रहेगी! देखें मुझमे या मेरे धैर्य में, किसमे कमी है? सभी बंधुओं को मेरा पुनः सदर नमस्कार.

akraktale के द्वारा
March 21, 2012

राकेश जी नमस्कार, कभी अपना बना ले पर कभी बेदर्द ठुकरा दे, सयाना जाम साकी! और आवारा मैखाना है. सुन्दर रचना बधाई. गया ना कभी उस राह पर, मै गम अपना गलत करने, जो जन्नत है पीने वालों की, वो मेरे गम का मैखाना है.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 21, 2012

स्नेही राकेश जी, सादर तेरे मैखाने में साकी भी है जाम और है पैमाना डूब गया कैसे निकलूं ये मेने न जाना. फकीरों को कहाँ यारो कभी मिलता ठिकाना है, बना था आशियाना, आज जो बिसरा मैखाना है! बधाई.

vikramjitsingh के द्वारा
March 21, 2012

राकेश जी सादर, कुछ कमियां (जो नज़रंदाज़ भी की जा सकती हैं) लेकिन बहुत ही भावपूर्ण शायरी, हम भी शौकीन हैं इस ‘लालपरी’ के, इसलिये यही कहेंगे… ”ईलाही पीने वालों की, कहीं बस्ती जुदा होती, जहाँ हुक्मन पिया करते, ना पीते तो सजा होती….”

yogi sarswat के द्वारा
March 21, 2012

राकेश जी नमस्कार ! बहुत बेहतर बुढ़ापे में यही बेटों ने ‘बस्तीवी’ दिया ताना, जवानी में लुटाया दोस्तों पे सारा मैखाना है. एक से बढ़कर एक शे’र ! लेकिन आज ऐसा लगता है नाम में कुछ बदलाव है ?

March 21, 2012

राकेश जी, एक बार फिर एक उत्कृष्ट रचना…….भाव बहुत ही मजबूत है…..परन्तु punctuation के अभाव में अभिव्यक्ति बिखरती हुई नजर आ रही है. मेरे कहने का मतलब है कि जो भाव आप दिए वो स्पस्ट रूप से पुन्क्तुअतिओन के अभाव में ग्रहण करता के पास नहीं पहुँच पाएंगे…..वैसे एक बार फिर आपकी इस रचना के लिए 5 star देना चाहूँगा…..आपने मुझे परममित्र का दर्जा अपने कमेन्ट में इससे पहले दिया है. वो मेरा सौभाग्य है. पर सचेत रहिएगा मैं अपने दोस्तों की कमिय निकलने के सिवा कुछ नहीं करता. ….आपका मित्र, अलीन


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