राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी'

राख सा दिखता हूँ, कभी आग बन जाऊंगा. टूटा हुआ सितार हूँ, कभी साज बन जाऊंगा. कलम टूटने के बाद स्याही बिखर जाती है, चुपचाप लिखता हूँ आज, कभी आवाज बन जाऊंगा..

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जिंदगी ले के चली

Posted On: 17 Mar, 2012 में

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जिंदगी ले के चली, एक ऐसी डगर,
राह के उस पार, चलते हैं हम सफ़र.


रात और दिन, मील के पत्थर जैसे हैं,
मोड़ बन जाते कभी, हैं चारों पहर.


फादना पड़ता है, दीवारें अनवरत,
ढूँढना चाहूँ मै, ‘उसको’ जब भी अगर.


शख्शियत में नये, बदलता हूँ धीरे से,
नये चेहरे मिले और, नये से राही जिधर.


द्वार-मंदिर मिले न मिले, पर चाहतें,
बांहों में ही भींचे रहती हैं, ता-उमर.


जिंदगी में लेने आता एक बार, पर-
बैठती हूँ रोज, ‘बस्तीवी’ सज संवर!


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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rakesh के द्वारा
March 21, 2012

मान्यवर योगी जी एवं श्री चन्दन जी, आप लोगो की दाद दिल से कुबूल है. बहुत बहुत धन्यवाद.

'राही अंजान' के द्वारा
March 20, 2012

खूबसूरत अल्फ़ाज़ राकेश जी ! पढ़कर आनंद आया । :)

yogi sarswat के द्वारा
March 19, 2012

राकेश जी सादर नमस्कार ! , सुन्दर भाव पूर्ण प्रस्तुति! बधाई. द्वार-मंदिर मिले न मिले, पर चाहतें, बांहों में ही भींचे रहती हैं, ता-उमर. इसी चाहतों के चलते हम सभी आशावान हैं!

chandanrai के द्वारा
March 19, 2012

राकेश जी नमस्कार, शख्शियत में नये, बदलता हूँ धीरे से, नये चेहरे मिले और, नये से राही जिधर. आदरणीय साहब, बिलकुल ठीक विचार ! बहुत बेहतर Pls. comment on http://chandanrai.jagranjunction.com/Berojgar

Rakesh के द्वारा
March 19, 2012

मान्यवर श्री अशोक जी, श्री आचार्य जी, श्री जवाहर जी एवं श्री प्रदीप जी, आप सभी लोगो का हार्दिक अभिनन्दन एवं आभार. श्रीमान जवाहर जी, आपकी बात सही है, की आकाँक्षाओं के कारन ही हम प्रयत्न करते हैं, किन्तु प्रयत्न और ‘workaholic’ में अंतर होना ही चाहिए. धन्यवाद.

akraktale के द्वारा
March 18, 2012

राकेश जी नमस्कार, जिंदगी ले के चली, एक ऐसी डगर, राह के उस पार, चलते हैं हम सफ़र. सुन्दर गजल. बधाई.

jlsingh के द्वारा
March 18, 2012

स्नेही राकेश जी, सुन्दर भाव पूर्ण प्रस्तुति! बधाई. द्वार-मंदिर मिले न मिले, पर चाहतें, बांहों में ही भींचे रहती हैं, ता-उमर. इसी चाहतों के चलते हम सभी आशावान हैं!

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
March 18, 2012

काफ़िया और रदीफ का अच्छा संगम , राकेश जी, बधाई !!

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 18, 2012

स्नेही राकेश जी सुन्दर भाव पूर्ण प्रस्तुति. बधाई.

Rakesh के द्वारा
March 18, 2012

मान्यवर दिनेश जी, अनिल जी एवं विकास जी, आप लोगो ने रचना ररही, बहुत बहुत धन्यवाद. जी विकास जी, मई उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले का हूँ, इसलिए अपने नाम के आगे “बस्तीवी” लगा लिया. पितृ भूमि है, सर आँखों पर रहनी चाहिए :-)

dineshaastik के द्वारा
March 18, 2012

भावपूर्ण सुन्दर अभिव्यक्ति…..

March 17, 2012

सादर नमस्कार! जीवन चलने का नाम चलते रहो सुबहों शाम……..हार्दिक आभार. कृपया इस ब्लॉग पर अपना बहुमूल्य विचार व्यक्त करना चाहें…. http://smtpushpapandey.jagranjunction.com/2012/03/17/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B9-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%A8-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5/#comment-31

vikaskumar के द्वारा
March 17, 2012

एक खूबसूरत गजल लिखी है आपने । भावों की बड़ी गहराई है आपकी गजल में । ‘बस्तीवी’ का अर्थ बता देते तो और अच्छा रहता ।


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