राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी'

राख सा दिखता हूँ, कभी आग बन जाऊंगा. टूटा हुआ सितार हूँ, कभी साज बन जाऊंगा. कलम टूटने के बाद स्याही बिखर जाती है, चुपचाप लिखता हूँ आज, कभी आवाज बन जाऊंगा..

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दिन फिर गये जो जी रहे अब तक अभाव में

Posted On: 14 Mar, 2012 में

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दिन फिर गये जो जी रहे अब तक अभाव में,
वादों से गर्म दाल परोसी चुनाव में.
ढूंढे नहीं मिला एक भी रहनुमा यहाँ,
सच कहने सुनने की हिम्मत रखे स्वभाव में.


तब्दीलियाँ है माँगते यों ही सुझाव में,
फिर भेज दी है मूरतियां डूबे गाव में,
दिल्ली में बैठ के समझेंगे वो बाढ़ को,
लाशें यहाँ दफ़न होने जाती है नाव में.


पूछा क्या रखोगे मुहब्बत के दाव में?
आ देख नमक लगा रक्खा है घाव में,
तुम हमको कभी, पत्थर मार देते तो,
लहरें बनाते सुन्दर दिल के तलाव में.


कोयला बना चमक कर हीरा दबाव में,
वीणा से सप्त सुर निकले तनाव में.
पौधे कभी वो छूते नहीं आसमान को,
पलते जो हैं किसी बड़े बरगद की छाँव में.


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17 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rakesh के द्वारा
March 16, 2012

माननीय डाक्टर बाली जी, श्री जय प्रकाश जी एवं श्री चन्दन जी, बहुत बहुत धन्यवाद. मान्यवर जय प्रकाश जी: जहाँ तक मुझसे बन पड़ा है मैंने सभी पंक्तियों को (२२१२१२/११/२२१२१२) में बिठाने की कोशिश की है, कुछ कमी हो तो कृपया खुलकर मार्ग दर्शन करें, आभारी रहूँगा.

Jayprakash Mishra के द्वारा
March 16, 2012

राकेश जी अच्छे भाव ,जरा शिल्प पर भी ध्यान दें..

March 16, 2012

राकेश भाई बहुत सुंदर और मार्मिक अभिव्यक्ति इस रचना के माध्यम से….ये पंक्तियाँ तो दिल को छू गयी कोयला बना चमक कर हीरा दबाव में, वीणा से सप्त सुर निकले तनाव में. पौधे कभी वो छूते नहीं आसमान को, पलते जो हैं किसी बड़े बरगद की छाँव में. बहुत बहुत बधाई !!

chandanrai के द्वारा
March 16, 2012

कोयला बना चमक कर हीरा दबाव में, वीणा से सप्त सुर निकले तनाव में. राकेश जी, बहुत सुन्दर हकीकत से रूबरू कराती रचना. बधाई

Rakesh के द्वारा
March 15, 2012

गुरुवर श्री शशि जी, प्रदीप जी, एवं मित्र अशोक जी, भाई आनंद जी, आप लोगो का जितना स्नेह मुझ पर है, उसे मै अपनी खुश किस्मती समझूंगा. बहुत बहुत आभार.

akraktale के द्वारा
March 15, 2012

राकेश जी, दिल्ली में बैठ के समझेंगे वो बाढ़ को, लाशें यहाँ दफ़न होने जाती है नाव में. बहुत सुन्दर हकीकत से रूबरू कराती रचना. बधाई.

shashibhushan1959 के द्वारा
March 15, 2012

मान्यवर राकेश जी, सादर ! राजनीति पर बड़ा महीन और नाज़ुक व्यंग्य ! बहुत अच्छा !

ANAND PRAVIN के द्वारा
March 15, 2012

राकेश भाई ज्यादा क्या तारीफ़ करूँ….इस रचना की वैसे तो कई बार पढ़ा….किन्तु दिल नहीं भरा………..लिखते रहें…..

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 15, 2012

पौधे कभी वो छूते नहीं आसमान को, पलते जो हैं किसी बड़े बरगद की छाँव में. सुन्दर भाव एवं प्रस्तुति. बधाई.

dineshaastik के द्वारा
March 15, 2012

जब गजल कोई निकलती, प्रेम जाल से, वाकिफ कराति है हमें, जनता के हाल से, उस गजल को मेरा है, शत-शत नमन सदा, राकेश गजलकार तुम, सचमुच कमाल के।     मात्रा, गति और लय की बाध्यता के कारण आप की जगह तुम शब्द का प्रयोग करना पढ़ा, इसके लिये क्षमा प्रार्थी हूँ

    Rakesh के द्वारा
    March 15, 2012

    आदरणीय श्री दिनेश जी एवं मित्रवर अनिल जी, सुप्रभात एवं रचना को सराहने के लिए धन्यवाद. श्री दिनेश जी: आप क्षमा माग के शर्मिंदा न करें, मैंने तो पहले भी कहा है की आप बड़े लोग सिर्फ आदेश करो, हम बाद उसका पालन करेंगे.

March 14, 2012

सादर नमस्कार! पौधे कभी वो छूते नहीं आसमान को, पलते जो हैं किसी बड़े बरगद की छाँव में…….बहुत बड़ी बात कही आपने, स्वतंत्र फिजाओं में अपनी साँस मांगती हुई जिंदगी जैसी पंक्तियाँ….हार्दिक आभार.

Rakesh के द्वारा
March 14, 2012

मित्रवर आकाश जी, अजय जी एवं योगी जी, सादर आभार.

yogi sarswat के द्वारा
March 14, 2012

कोयला बना चमक कर हीरा दबाव में, वीणा से सप्त सुर निकले तनाव में. पौधे कभी वो छूते नहीं आसमान को, पलते जो हैं किसी बड़े बरगद की छाँव में. राकेश जी नमस्कार ! ऐसी बेहतरीन कविताओं को पढ़कर कभी कभी प्रतिक्रिया देने के लिए शब्द नहीं मिल पाते ! बस इतना ही कह सकता हूँ , अति सुन्दर भाव ! बहुत बढ़िया !

    jlsingh के द्वारा
    March 16, 2012

    आदरणीय राकेश जी, सादर अभिवादन! मैं भी योगी जी की बातों से पूरी तरह सहमत हूँ! वास्तव में बेहतरीन प्रस्तुति आपने दी है बधाई!

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 14, 2012

राकेश जी नमस्कार, यह हमारा देश है जहाँ गरीबों के कल्याण की बातें फाइव-स्टार होटलों में होती हैं. सुन्दर प्रस्तुति….

Aakash Tiwaari के द्वारा
March 14, 2012

राकेश जी, बस वाह-वाह करने की इच्छा हो रही है..लाजवाब आकाश तिवारी


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