राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी'

राख सा दिखता हूँ, कभी आग बन जाऊंगा. टूटा हुआ सितार हूँ, कभी साज बन जाऊंगा. कलम टूटने के बाद स्याही बिखर जाती है, चुपचाप लिखता हूँ आज, कभी आवाज बन जाऊंगा..

69 Posts

399 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 8050 postid : 426

माग मत अधिकार अपना

Posted On 10 Mar, 2012 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

माग मत अधिकार अपना, ये अनैतिक कर्म है,
ठेस लगती है हुकूमत का बहुत दिल नर्म है.


हक हमारा कुछ नहीं, पुरखे हमारे लापता,
हर तरक्की के लिए बस ‘द्रष्टि उनकी’ मर्म है.


सैर को आये कभी जब समझ उपवन गाँव को,
खेत सूखे देख कर गर्दन झुकी है, शर्म है.


कह दिया गर ‘भूख से हम मर रहे है ऐ खुदा!’
बोला गया तब सब्र और विश्वास रखना धर्म है.


कट गए सद्दाम या लादेन, गद्दाफी सड़क पर,
तब समझ में आ गया खूं कौम का भी गर्म है!


लूट, हिंसा और लिप्सा से निकलए शेख जी,
भोर होने आ चली, काली निशा का चर्म है.


————— मध्य प्रदेश की सरकार की ख़ामोशी के नाम.

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 4.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

15 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

dineshaastik के द्वारा
March 12, 2012

आदरणीय राकेश जी नमस्कार, शिवराज सरकार के अलावा सभी जानते हैं कि नरेन्द्र सिंह की हत्या खनन या रेत माफियाओं ने करवाई है। आश्चर्य फिर भी मध्य प्रदेश की जनता खामोश……… अच्छा व्यंग….. 

    Rakesh के द्वारा
    March 12, 2012

    Mananiya Dinesh ji evam Vikas ji sadar namaskaar. Jaisa ki aapane kaha hi ki sarkaar ise haadasaa bata rahi hai, ye apane aap me ek hasyaspad sthiti hai. “ye siyasatki tavayaf ka dupatta hai, kisike ansuon se nam nahi hota.”

vikaskumar के द्वारा
March 11, 2012

गुस्से की सार्थक अभिव्यक्ति । व्यवस्था की विसंगति को आपने जोरदार तरीके से प्रकट किया है । प्रशंसनीय  कविता ।

Rakesh के द्वारा
March 11, 2012

आदरणीय गुरुजन प्रदीप जी, शशि जी, जवाहर जी, एवं मेरे परम मित्र श्री अनिल जी, माननीया मीनू जी, श्री बनारसी बाबु जी, श्री आकाश भाई, श्री आनंद जी ,श्री अशोक जी एवं श्री चन्दन जी, आप सभी लोगो का प्यार और आशीर्वाद ही है जो ये रचना प्रस्तुत कर पाया हूँ. आप सभी भद्र जनों को मेरा सादर धन्यवाद.

March 11, 2012

सादर नमस्कार! कट गए सद्दाम या लादेन, गद्दाफी सड़क पर, तब समझ में आ गया खूं कौम का भी गर्म है!…..बहुत खूब राकेश जी……

shashibhushan1959 के द्वारा
March 11, 2012

मान्यवर राकेश जी, सादर ! बहूत खूब ! वास्तविक प्रसंशा योग्य ! आक्रोश भरी ! चेतावनी देती ! बहुत अच्छा राकेश जी, बधाई !

Aakash Tiwaari के द्वारा
March 10, 2012

राकेश जी, वास्तव में मध्य प्रदेश में जो हुआ उसे सुनकर तकलीफ और गुस्सा बहुत आया..आपके लेख ने सच्चाई को बयां किया है.. आकाश तिवारी

jlsingh के द्वारा
March 10, 2012

माग मत अधिकार अपना, ये अनैतिक कर्म है, ठेस लगती है हुकूमत का बहुत दिल नर्म है. आदरणीय राकेश जी, नमस्कार! मध्य प्रदेश सरकार के नाम यह पत्र, IAS अधिकारी (मधु) के सूखे आंसू से निकलती बददुआ उनके सुहाग उजाड़नेवाले को लगे! रहिमन आह गरीब (अबला) की कबहू न निष्फल जाय…… मर्मान्तक रचना! आपकी सृजनशीलता को नमन!

ANAND PRAVIN के द्वारा
March 10, 2012

राकेश भाई, नमस्कार सच्चाई यही है ………..की वो अधिकार नहीं होते जिन्हें माँगा जाता है……… बहोत सुन्दर ……….लिखते रहें

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    March 10, 2012

    सुन्दर कविता,बधाई !! राकेश जी.आज के ज़माने में बिना मांगे कुछ मिलता है क्या?जरा देखिये, अधिकार के लिए कितनी लड़ाईयां हो रही हैं.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 10, 2012

माग मत अधिकार अपना, ये अनैतिक कर्म है, ठेस लगती है हुकूमत का बहुत दिल नर्म है. क्या बात है. स्नेही राकेश जी. वाह. वाह. सुन्दर भाव, प्रस्तुति. बधाई.

akraktale के द्वारा
March 10, 2012

राकेश जी, ऐसी ही सुन्दर रचनाओं से जाग्रति बनाए रखिये. बधाई.

chandanrai के द्वारा
March 10, 2012

कट गए सद्दाम या लादेन, गद्दाफी सड़क पर, तब समझ में आ गया खूं कौम का भी गर्म है! लूट, हिंसा और लिप्सा से निकलए शेख जी, भोर होने आ चली, काली निशा का चर्म है. guru ji. Maan gaye sir, a great poem . May every body read this. http://chandanrai.jagranjunction.com

minujha के द्वारा
March 10, 2012

रोकेश जी आपकी इस रचना पर अपनी भावाभिव्यक्ति तो मैंने कर ही दी थी दुबारा से आपको बधाई जरूर देना चाहुंगी

बनारसी बाबू के द्वारा
March 10, 2012

आदरणीय राकेश जी, सुंदर मर्मस्पर्शी शब्दों में आपने विरोध के स्वर प्रकट किये हैं| ऐसी रचनाएँ कम ही पढ़ने को मिलती हैं| सादर,


topic of the week



अन्य ब्लॉग

  • No Posts Found

latest from jagran