राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी'

राख सा दिखता हूँ, कभी आग बन जाऊंगा. टूटा हुआ सितार हूँ, कभी साज बन जाऊंगा. कलम टूटने के बाद स्याही बिखर जाती है, चुपचाप लिखता हूँ आज, कभी आवाज बन जाऊंगा..

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होली मुबारक

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आदरणीय प्रदीप जी, शशि जी, निशा जी, आनंद जी, अलीन जी, अशोक जी एवं मेरे सभी मित्रो, आपको एवं आपके परिवार को होली की ढेर सारी बधाइयाँ एवं मंगलकामनाएं:


मान और अपमान पिया, तब असर दिखाई भंगोली,
धर्म पंथ को छोड़ दिया, तब मिलते सच्चे हमजोली,
गले मिलो तो फिर तुम ऐसे, जात-पात मत पूछो हे!
कई रंग में गुंथ कर बनती, इस समाज की रंगोली.


पुनि पुनि भीगे ड्योढ़ी आँगन, कण कण उभरे रंगोली,
रंग चढ़े इस बार अगर तो, उतरे फिर अगली होली.
कैसा पुलकित दृश्य उपस्थित, भीग रहे नटवर नागर,
राधा संग गोपों की टोली, गोपियों प्रभु की हमजोली.


भेद मिट गया, सराबोर है, अंतस, देह, और चोली,
प्रभु भक्ति मदमस्त कर रही, जबरदस्त यह भंगोली.
तृप्त हो गया, जी भर छाना, ऐसी ठंडई कहाँ मिले?
कृष्ण खड़े हैं लिए बांसुरी, मन मोदित है यह होली.


मोह, ईर्षा और दंभ को, जला होलिका में बोली-
‘सा-रा-रा-रा’, दिग्दिगंत के बंध खुल गए इस होली,
मुझको फर्क नहीं दिखता है, ‘राधा’ या ‘गोविंदा’ का,
दोनों की चुनरी को मैंने, ‘हरे’ रंग में है घोली.


‘हरि’ बन जाते पिचकारी, मै बन जाता हूँ तरल रंग,
मेरा अंतस श्वेत दुग्ध औ, प्रभु की काया गरल भंग,
भीगे सारे रंग शिथिल हो, बरसे चूनर औ चोली,
मेरा सेवन कर के देखो, भंग झूमता इस होली.


गुलमोहर के फूलो से है, मौसम खेल रहा होली,
पीले सरसों के फूलो से, रंगी धरती की चोली,
बख्शा है मौसम ने सबको, थोड़ी मस्ती, बरजोरी,
भंग चढ़ा है पुरवा को भी, डगमग डगमग है डोली,


वर्ष परक है चित्त लुभावन, मदिरालय की है होली,
कानो में फगुआ से घोले, साकी बाला की बोली,
ना-ना-ना-ना करते रहते, जब तक बोतल ना खोली,
भद्र जनों ने दिखलाया फिर, क्या है भंग सहित होली!


छुई नहीं ब्रज की माटी है, गया नहीं मै बरसाना,
देखा नहीं अवध में मैंने, राम लाला का फगुआना.
दे पाउ अनाथ बच्चो को, वापस यदि मै हंसी ठिठोली,
धन्य रहेगा रंग खेलना, आत्मसात होगी होली.


फागुन में इस बार पड़ी है, मित्रो लोकतंत्र की होली,
वोट मागने निकल पड़ी है, नेता लोगो की टोली.
पांच साल के वादो का फगुआ गा-गा कर जाते हैं,
जनता के कुरेद जख़्मो को, खेल रहे हैं ये होली !


दुश्मन दल की चिता जला, मनती है उनकी होली,
खुद खाते, दुश्मन को देते, गुझिया शायद है गोली.
घाटी ब्रज-बरसाना जैसी, बंदूके पिचकारी सम,
खून से लथपथ-सराबोर है, वीर जवानो की चोली.


राष्ट्र गान का फगुआ गाती, हिंद सपूतो की टोली,
जोश-खरोश में गूंज रही है, भारत के जय की बोली.
भांग चढ़ा है देश प्रेम का, झूम रहे गलबहियाँ डाल,
मस्ती की जो यहाँ छटा है, और कहाँ ऐसी होली?


होली मुबारक.

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rakesh के द्वारा
March 11, 2012

अग्रज श्री जवाहर जी, आपके हौसला अफजाई से बहुत प्रसन्नता हुयी. माफ़ी माग कर शर्मिंदा न करें, हम आपसे छोटे हैं आप लोग आदेश दें. माननीय प्रदीप जी तो नीर छीर विवेकी हैं, यह अग्र जनों का आदेश को हम नहीं दर किनार कर सकते, यही हमें संस्कार मिले है. अब इसके लिए चाहे कितनी भी आग की दरिया पार करनी पड़े, हम तैयार हैं. और मुझे तो आप लोगो की दोस्ती और आशीर्वाद कमानी है, वो मिल ही रही है.

jlsingh के द्वारा
March 10, 2012

राष्ट्र गान का फगुआ गाती, हिंद सपूतो की टोली, जोश-खरोश में गूंज रही है, भारत के जय की बोली. भांग चढ़ा है देश प्रेम का, झूम रहे गलबहियाँ डाल, मस्ती की जो यहाँ छटा है, और कहाँ ऐसी होली? आदरणीय राकेश जी, सादर अभिवादन! सर्वप्रथम आपको मैं आभार ब्यक्त करना चाहूँगा कि बहुत सुन्दर मनमोहक रचना के साथ मंच पर वापस आए हैं! मेरी नजर देर से पडी इसके लिए माफी चाहूँगा! बाकी भाव और विचार जो प्रदीप कुशवाहा जी ब्यक्त किये हैं, उनसे मैं पूरी तरह सहमत हूँ! उम्मीद है कि अब आपकी अच्छी अच्छी रचनाएँ पढने को मिलेगी!…

minujha के द्वारा
March 8, 2012

अच्छी प्रस्तुति राकेश जी,आपको भी होली की मुबारकबाद

    Rakesh के द्वारा
    March 10, 2012

    Mananiya Minu ji, sadar dhanyavaad.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 8, 2012

उत्कृष्ट प्रस्तुति. दे पाउ अनाथ बच्चो को, वापस यदि मै हंसी ठिठोली, राष्ट्र गान का फगुआ गाती, हिंद सपूतो की टोली, जोश-खरोश में गूंज रही है, भारत के जय की बोली. भांग चढ़ा है देश प्रेम का, झूम रहे गलबहियाँ डाल, मस्ती की जो यहाँ छटा है, और कहाँ ऐसी होली? मैं आपका व्यक्तिगत रूप से आभारी हूँ. बहुत सुन्दर रचना एवं भाव हैं. मेरे दिल की बात आप जान गए होंगे. आप की लेखन कला विचार अभिव्यक्ति सराहनीय है. शुभ होली. स्वागत है. सारा हिंदुस्तान हमारा है.

shashibhushan1959 के द्वारा
March 8, 2012

आदरणीय राकेश जी, सादर ! “अद्भुत-मनमोहक-सम्मोहक रच डाली रचना ऐसी ! पिया, पिलाया सब लोगों को, घोल काव्य-रस की गोली ! मंच नशीला हुआ, सभी मदहोश हुए हैं झूम रहे, मस्ती की जो यहाँ छटा है, और कहाँ ऐसी होली?” . बहुत सुन्दर ! बहुत बढ़िया ! होली की शुभकामनाएं !

    Rakesh के द्वारा
    March 10, 2012

    Adarneey Shahsi ji, saadar pranaam, Apke evam aapke parivaar ko holi ki shubhkamnaaye. Thoda Career ko le ke busy hun, to yahan baar baar ana ho nahi pa raha hai, isakeliye kshama.

dineshaastik के द्वारा
March 8, 2012

राकेश जी नमस्कार, आपने तो सब कुछ होली के रंग में रँग दिया, धर्म,  प्रकृति, समाज, राजनीति एवं देश भक्ति। खूबसूरत रचना की प्रस्तुति के लिये बधाई….होली की शुभकामनायें….. कृपया इसे भी पढ़े तथा समालोचनात्मक प्रतिक्रिया देकर अपने विचारों से अवगत करायें- http://dineshaastik.jagranjunction.com/2012/03/04/क्या सचमुच ईशवर है (कुछ सवाल)

akraktale के द्वारा
March 7, 2012

राकेश जी नमस्कार, आपने तो इस होली में प्रकृति, देवता और नेता सबको लपेट डाला है और अंत में सब पर देशभक्ति का भी रंग डाला है. सुन्दर रचना. बधाई.

ANAND PRAVIN के द्वारा
March 7, 2012

राकेश भाई, नमस्कार आप आय बहार आई, जबरदस्त प्रश्तुती……………लाजबाब शब्दों का संयोजन…………… आपको सपरिवार होली की हार्दिक शुभकामनाय

    March 7, 2012

    आप दोनों की भी होली की हार्दिक शुभकामनायें! सचमुच राकेश भाई, आप आये बहार आई बस वाहिद भाई की कमी खल रही है. उनके बिना इस मंच की होली कुछ फीकी लग रही हैं. अरे मित्र कोई रचना अच्छी लगती है तो उसके हिसाब से रेटिंग भी कर दिया करों. चलो कोई बात नहीं मैं कर देता हूँ. वैसे राकेश भाई, जो इस रचना के भाव है उसके लिए 5 star भी कम है….सार्थक, विचारणीय, अर्थपूर्ण और सराहनीय भी…….हार्दिक आभार.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    March 7, 2012

    सुन्दर कविता, बधाई!! राकेश जी.होली के विभिन्न रंगों से सराबोर यह कविता वाकई सराहनीय है. होली की हार्दिक शुभकामनाएं.


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