राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी'

राख सा दिखता हूँ, कभी आग बन जाऊंगा. टूटा हुआ सितार हूँ, कभी साज बन जाऊंगा. कलम टूटने के बाद स्याही बिखर जाती है, चुपचाप लिखता हूँ आज, कभी आवाज बन जाऊंगा..

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शाही जी के लिए

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माननीय शाही जी,

आपने कमेन्ट ब्लाक कर रक्खा है, इसलिए मै अपने पोस्ट में लिख रहा हूँ.

मै भी मान्यवर शशी जी, आकाश जी की तरह अब कोई पोस्ट नहीं करूँगा.

“I will return when I find the system clean and transparent. Thanks JJ”.

Please pardon me for my earlier words. Thanks.

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 1, 2012

भरो ताजगी जोश होश सब सूरज चंदा बन चमकें धरती गगन सा हो विस्तृत मन पुलकित रोम-रोम मन महके मुक्त फिरें हम संग-संग गाते सब को गले लगाओ अब आओ अब आओ ….. बिछड़े साथी सब रंग मंच के आवाहन कर भ्रमर जी बुलाओ सूना उपवन कातर मन शमशान हुआ बैरागी मन कंठ अवरुद्ध , माला टूटी जे जे मंच की गयीं विभूति कैसी संस्कारों की ये रीती फैला तम दुखी मेरा मन जे जे पर फिर दिया जलाओ आदरणीय भ्रमर जी की नई रचना से साभार.

    Rakesh के द्वारा
    March 1, 2012

    आदरणीय प्रदीप जी, सादर नमस्कार. हम आपके आदेश का पालन करेंगे, परन्तु पहले नहीं वरिष्ठ जनों के बाद ही, तब तक के लिए मुझे क्षमा कर दे. आपके आशीर्वाद से वंचित होना बहुत खल रहा है.

February 28, 2012

राकेश जी आपकी भावनाओं की क़द्र करता हूँ पर यह कोई भाषा नहीं अपनी भावों को व्यक्त करने का. आप एक लेखक और कवि है, यह सब शोभा नहीं देता. आप इस तरह अपनी ही प्रतिष्ठा गवां रहें है. इस तरह तो सामने वाले के लिए उसका काम और आसान हो जायेगा…

    Rakesh के द्वारा
    February 28, 2012

    माननीय अनिल जी, मेरी गलती बताने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया. धन्यवाद.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 28, 2012

सिस्टम में रहकर सिस्टम में अपनी आवाज उठा कर लोकतान्त्रिक व्यवस्था लागू करना है. ये संघर्ष अपने लिए नहीं है दूसरे ब्लोगर्स के लिए है. संकट के समय धैर्य संयम नहीं खोना चाहिए .वरिष्ठ जन विचार करें . पलायन किस प्रकार श्रेष्ठ होगा..?

    Rakesh के द्वारा
    February 28, 2012

    आदरणीय प्रदीप जी, सादर प्रणाम. मेरी नजर में ये “Right to reject” है. जिसकी बहुत सी लोग पैरवी कर रहे हैं. धन्यवाद.

    PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
    March 1, 2012

    सहमत


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