राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी'

राख सा दिखता हूँ, कभी आग बन जाऊंगा. टूटा हुआ सितार हूँ, कभी साज बन जाऊंगा. कलम टूटने के बाद स्याही बिखर जाती है, चुपचाप लिखता हूँ आज, कभी आवाज बन जाऊंगा..

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Rakesh


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सपने: ओ बी ओ महोत्सव क्रमांक -18

Posted On: 20 Apr, 2012  
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हम पंछी एक डाल के

Posted On: 12 Apr, 2012  
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ओ बी ओ के तरही मुशायरा २१ के लिए

Posted On: 30 Mar, 2012  
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हमको बहुत लूटा गया

Posted On: 25 Mar, 2012  
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मैखाना है

Posted On: 21 Mar, 2012  
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जिंदगी ले के चली

Posted On: 17 Mar, 2012  
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दिन फिर गये जो जी रहे अब तक अभाव में

Posted On: 14 Mar, 2012  
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माग मत अधिकार अपना

Posted On: 10 Mar, 2012  
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होली मुबारक

Posted On: 7 Mar, 2012  
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Others मस्ती मालगाड़ी में

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शाही जी के लिए

Posted On: 28 Feb, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: Rakesh Rakesh

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आदरणीय प्रदीप जी, श्री अशोक जी, श्री विक्रम जी, श्री अनिल जी एवं श्री योगी जी, आप सभी लोगो ने ये कविता पढ़ीं और यह पेज छोडने से पहले अपने बहुमूल्य विचार मेरे लिए रख छोड़े , इसके लिए ह्रदय से आभारी हूँ. श्री प्रदीप जी: सादर! अगर आप इस काव्य में एक पल के लिए भी दुबे, तो लिखना धन्य हो गया. धन्यवाद. श्री अशोक जी: बहुत खूब एक आशार आपने कह दिया, बधाई हो आपको भी. आपके लिए ही हरिवंश जी ने लिखा है की, जला ह्रदय की भट्टी खिंची! श्री विक्रम जी: आपने तो एकदम कमल का शेर प्रस्तुत किया, सजा तो हुक्मन को ऐसे ही हीनी चाहिए, पिला के मारो तो मजा कुछ और होगा. श्री योगी जी: जैसा मैंने पहले ही कहा था की यू पी का बस्ती जिला अपने पितरों की भूमि है, उसे अपने नाम के साथ जोड़ लिया है, जहाँ भी जाऊँगा साथ रहेगा. श्री अनिल जी: 'Punctuation' वाली बात मेरे दिमाग को खटक रही थी, किन्तु आप यों कह ले की आलस वश या फिर लापरवाही की वजह से ठीक नहीं की, आपने ये चिन्हित कर बहुत बड़ा उपकार किया है. आप तो मित्र है, आप जो भी कहेंगे मेरी भलाई के लिए ही, है ना! जरा निम्न पंक्तियों पर गार कीजिये: चलो देखें, हमारी आँखों में, कितनी नमी है? इरादे आसमां जैसे, ढके पूरी जमीं है, सड़क की ठोकरें, यों पाठ तू बनती रहेगी! देखें मुझमे या मेरे धैर्य में, किसमे कमी है? सभी बंधुओं को मेरा पुनः सदर नमस्कार.

के द्वारा: Rakesh Rakesh

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के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

अलीन जी आपका अनिल नाम जान कर ख़ुशी हुई. सादर नमस्कार. सही कहा आपने , जागो ग्राहक जागो. अब बोर्नविटा वाले बच्चे जादा लम्बे हो जाते हैं, अमिताभ बच्चन या अक्षय कुमार ने तो शायद नहीं पिया था. अब क्या भारतीय जनता केस करगी "Revital" पर की उसे खाने से युवराज को कन्सर हुआ है? हम सब लोग 'कारपोरेट क्राइम' के शिकार हो रहे हैं. वेदान्त ने पूरे उडीसा को खोद डाला. और कह रहे हिं की २० लाख बच्चो की मिड डे मेल्स देते हैं, What a bull shit!!! I know my friends personally who are suffered from vedanta and their mines. अलीन भाई ऐसा 'Cartle' है की हम और आप समझ भी नहीं पाएंगे, बस यही सोचेंगे की इन्ही से देश की प्रदाती हो रही है, शाइनिंग इण्डिया इन्ही के कारन है. बहुत बहुत धन्यवाद.

के द्वारा: Rakesh Rakesh

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के द्वारा: Rakesh Rakesh

बहुत बहुत शुक्रिया मनीष जी. आपने हमारी भावनाओ को सराहा, बहुत अच्छा लगा. खफा मै, 'एम् ऍफ़ हुसैन' और 'रुश्दी' साहब दोनों से हूँ. पर और भी ऐसे बहुत हैं, जिनके लिए गरीबी, बदहाली, अमन, मुहब्बत पर लिखने के लिए कुछ नहीं है. और मीडिया की तरह 'sensation' लिखने में आगे आ जाते हैं. अब ब्रिटिश का तो काम ही है जो आपस में लादे उसे और बढ़ावा दो. जो अपने 'culture' को गली दे, उसे और सराहो. मै व्यक्तिगत रूप से 'रुश्दी' साहब को एक 'mediocre talent' ही मानुगा. बुकर न तो नोबेल है और न ही पुलित्जर. और हिंदुस्तान में 'RK Naraynan ' से ले के रबीन्द्र बाबु या फिर सदाबहार प्रेम चंद जैसे लेखक हुए हैं जिन्हें इनाम देना सूरज को दिया दिखाना है. पर कभी 'sensation' नग्नता का सहारा नहीं लिया. ये पोस्ट-'modernism' ने एक तो ढंग का साहित्य लिखना बंद कर दिया और जिसने लिखा भी वो बुकर के चक्कर में. माना 'स्वर्गीय हुसैन' साहब बहुत बड़े चित्रकार थे, किन्तु भक्ति तो रसखान के भी दिल में जागी थी कृष्ण के लिए. और ऊपर से जहाँ पर धार्मिक भावनाए पहले से ही इतनी हिंसक है, ऐसी आग पर हाथ सेकना कहाँ तक वाजिब है.

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